Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 72, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 72, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
राजोवाच ।
कालसत्ता नभःसत्ता स्पन्दसत्ता च चिन्मयी ।
शुद्धचेतनसत्ता च सर्वमित्यादि पावनम् ॥ १ ॥
परमात्ममहावायौ रजः स्फुरति चञ्चलम् ।
कुसुमाङ्ग इवामोदस्तदतद्रूपकं स्वतः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह प्रथम प्रश्न का उत्तर देकर (कस्मिन् स्फुरति पवने महागगनरेणव:” इस द्वितीय प्रश्न
का राजा समाधान करते हैं । उसमें महागगनरेणव:” इस पद मे स्थित गगनशब्द से तुम प्रसिद्ध
आकाश का ग्रहण करो अथवा “महत् पद से विशेषित होने के कारण गौणीवृत्ति से महाकालस्वरूप
वित्संवलित महाकाश का ग्रहण करो या स्पन्दशक्तिप्रधान सूत्रात्माकाश का ग्रहण करो अथवा
उससे निर्मुक्त शुद्धविदाभासस्वरूप जीवाकाश का ग्रहण करो या और किसी दूसरे का ग्रहण करो,
फिर भी उन सभी विकल्पो में अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण तत्-तत् सत्ता का ही तुमने
महागगनरेणुरूप से वर्णन किया है, यह कहते है ।
राजा ने कहा : हे वेताल, कालसत्ता, आकाशसत्ता, क्रियाशक्तिप्रधान सूत्रात्मा की सत्ता तथा
क्रियाशक्तिप्रधान चेतन से निर्मुक्त जो चिदाभासरूप शुद्ध चेतन है, उसकी चिन्मयी सत्ता-इत्यादि
सब सूक्ष्म होने से निर्दोष रज है, वह परमात्मारूपी महावायु मे कल्पित अनेक विकारों से चंचल होकर
स्फुरति होता है ।
सकल पवार्थों में अनुगत सत्तारूप जब परमात्मा ही है, तव परमात्मारूपी महावायु में कालादि की
सत्ता स्फुरित होती है -इस तरह अभिन्न में आधारआधेयभाव का व्यपदेश (निरूपण) कैसे हुआ ?
यदि ऐसी कोई आशंका करे, तो उस पर कहते है ।
जैसे पुष्प स्वयं अपने अंग मे आमोदनामक भेद की (सुगन्ध की) अपने ही द्वारा कल्पना कर पुष्पों
में आमोदरूपवाला वह आधेयरूप से अवस्थित है वैसे ही परमात्मसत्ता ही अपने कालादिसत्ता के भेद
की कल्पना करके अवस्थित हे
सर्ग सन्दर्भ
इकहत्तरवाँ सर्ग समाप्त बहत्तरवाँ सर्ग उत्तर सुनने के लिए सावधान वेताल को राजा द्वारा अवशिष्ट पाँच प्रश्नों का क्रमशः उत्तर देना ।